1.

कर्ण का मित्रधर्म।

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कर्ण का जीवन अन्याय और अपमान से भरा हुआ था। एक दुर्योधन ने ही उसे सम्मान दिया और उसे अपना मित्र बनाया। कर्ण दुर्योधन के इस उपकार को कभी नहीं भूल पाया। महाभारत का युद्ध शुरू होने से पहले श्रीकृष्ण उसे पांडवपक्ष में लेने गए। उन्होंने उसे राज्य देने का प्रलोभन भी दिया। परंतु कर्ण ने उनका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। उसने दुर्योधन का साथ छोड़ने से स्पष्ट इनकार कर दिया। इस प्रकार कर्ण ने दुर्योधन के प्रति अपने मित्र-धर्म का पालन किया।



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