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कण्ठस्थीकरण अथवा स्मरण करने की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए। |
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Answer» कण्ठस्थीकरण अथवा स्मरण कण्ठस्थीकरण अथवा स्मरण करना एक मानसिक प्रवृत्ति है। मानव की स्मरण शक्ति यद्यपि प्रकृति की उसे एक अनुपम देन है, किन्तु यदि इसे समुचित रूप से प्रयोग में लाया जाए तो समय एवं शक्ति, दोनों की ही पर्याप्त रूप से बचत की जा सकती है। किसी विषय-सामग्री को स्मरण करने में लाघव तथा मितव्ययिता लाने के उद्देश्य से मनोवैज्ञानिकों ने सतत प्रयास किये हैं। इसके परिणामस्वरूप स्मरण करने की कुछ मितव्ययी विधियों की खोज सम्भव हुई, जिनकी सहायता से कम समय में अधिक-से-अधिक सामग्री याद की जा सकती है। कण्ठस्थीकरण या स्मरण की मितव्ययी विधियाँ स्मरण या कण्ठस्थीकरण की मितव्ययी विधियाँ निम्नलिखित हैं। (1) पुनरावृत्ति अथवा दोहराना (Repetition)- स्मरण करने की यह एक पुरानी तथा प्रचलित विधि है। सरल होने के कारण यह लोकप्रिय भी है। इस विधि में याद की जाने वाली सामग्री या पाठ को अनेक बार दोहराया जाता है। बार-बार दोहराने से वह पाठ स्मृति में गहराता जाता है। जितनी ही अधिक बार उसे दोहराया जायेगा, उतने ही गहरे स्मृति-चिह्न या संस्कार मस्तिष्क पर बन जाते हैं। आवृत्ति अर्थात् विषय-सामग्री को मन-ही-मन दोहराने से उसे स्थायित्व प्राप्त होता है; अतः कण्ठस्थीकरण करने वाले को चाहिए कि वह पाठ को कई बार पढ़े तथा अनेक बार मन-ही-मन दोहराए। इस विधि से कोई भी विषय-सामग्री कम-से-कम समय में दीर्घकाल के लिए याद हो जाती है। पुनरावृत्ति विधि का प्रयोग करते समय ध्यान रहे कि सामग्री सार्थक हो, तभी उसके वांछित परिणाम सामने आएँगे। छोटे बालकों को कविताएँ, दोहे तथा पहाड़े याद करने में यह विधि बहुत लाभप्रद है। (2) पूर्ण विधि (Whole Method)- पूर्ण विधि में सम्पूर्ण विषय या पाठ को एक ही बार में एक साथ याद किया जाता है। यदि बालक किसी कविता या कहानी को कण्ठस्थ करना चाहता है तो पूर्ण विधि के अनुसार वह समूची सामग्री को एक ही बार में याद करेगा। समय-समय पर होने वाले प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि कठिन एवं लम्बे पाठों की तुलना में सरल एवं छोटे पाठ पूर्ण विधि से सुगमतापूर्वक याद किये जा सकते हैं। इसके अलावा यह विधि मन्द-बुद्धि के बालकों की अपेक्षा तीव्र-बुद्धि के बालकों के लिए अधिक लाभप्रद मानी जाती है। यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय है कि सीखने की अल्पकालीन अवधि में इस विधि के परिणाम अधिक अच्छे नहीं आते, इसके लिए लम्बा समय उपयुक्त है। पूर्ण विधि के अन्तर्गत याद की जाने वाली सामग्री के अधिक लम्बा होने पर उसे खण्डों में बाँटेकर याद किया जा सकता है, किन्तु इससे पहले समूची सामग्री को आदि से अन्त तक भली-भाँति पढ़ लेना आवश्यक है। (3) आंशिक या खण्ड विधि (Part Method)- स्मरण की आंशिक या खण्ड विधि के अन्तर्गत पहले पाठ अथवा सामग्री को पृथक्-पृथक् अंशों/खंडों में विभाजित कर लिया जाता है, फिर एक-एक खण्ड को याद करके समूची विषय-सामग्री को कण्ठस्थ कर लिया जाता है। इस प्रकार यह विधि पूर्ण विधि के एकदम विपरीत है। मान लीजिए, बालक को एक लम्बी कविता याद करनी है तो वह पहले उसके एक पद को याद करेगा तब बारी-बारी से कविता के दूसरे तीसरे :: :: चौथे पदों पर ध्यान केन्द्रित करता जायेगा। (4) मिश्रित विधि (Mixed Method)– मिश्रित विधि में विशेषकर जब विषय-सामग्री काफी लम्बी हो, पूर्ण एवं आंशिक दोनों विधियों को एक साथ लागू किया जाता है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत एक बार समूची याद की जाने वाली सामग्री को पूर्ण विधि की सहायता से याद करने का प्रयास किया जाता है, फिर उसे छोटे-छोटे खण्डों में करके याद किया जाता है। स्मरण के दौरान विभिन्न खण्डों का सम्बन्ध एक-दूसरे से जोड़ना श्रेयस्कर है। बहुधा देखने में आया है कि पूर्ण एवं आंशिक विधि की अपेक्षा मिश्रित विधि अधिक उपयोगी सिद्ध हुई है। (5) व्यवधान सहित या सान्तर विधि (Spaced Method)- व्यवधान सहित या सान्तर जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, स्मरण करने की इस विधि में विषय-सामग्री को कई बैठकों में याद किया जाता है। दिन में थोड़े-थोड़े समय का व्यवधान (अन्तर) देकर पाठ को दोहराकर कंठस्थ किया जाता है। यह विधि स्थायी स्मृति के लिए काफी उपयोगी है।। (6) व्यवधान रहित या निरन्तर विधि (Unspaced Method)– सान्तर विधि के विपरीत निरन्तर या व्यवधान रहित विधि में विषय-सामग्री को एक ही बैठक में कंठस्थ करने का प्रयास किया जाता है। इसमें पाठों को बिना किसी व्यवधान के दोहराकर याद किया जाता है। (7) सक्रिय विधि (Active Method)– सक्रिय विधि का दूसरा नाम उच्चारण विधि है। इसमें किसी विषय-सामग्री को बोलकर, आवाज के साथ पढ़कर याद किया जाता है। एबिंगहास तथा गेट्स आदि मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से यह निष्कर्ष निकाला कि कण्ठस्थीकरण की सक्रिय विधि अत्यधिक उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण विधि है। इस विधि द्वारा स्मरण करने से व्यक्ति के मस्तिष्क में याद की जाने वाली सामग्री का ढाँचा तैयार हो जाता है, विषय का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है, सामग्री के विविध खण्डों का लयबद्ध समूहीकरण होता है, उनके बीच सार्थक सम्बन्ध स्थापित होते हैं तथा याद की गई सामग्री का आभास होता रहता है। उच्चारण के साथ याद करने में व्यक्ति रुचि लेकर प्रयास करता है तथा उसकी सक्रियता में वृद्धि होती है। बहुधा सक्रिय विधि के दौरान शरीर के अंगों में गति (हिलना-डुलना) देखा जाता है। (8) निष्क्रिय विधि (Passive Method)- निष्क्रिय विधि में किसी विषय-सामग्री को बिना बोले मन-ही-मन याद किया जाता है। सक्रिय विधि के लाभों को जानकर यह निष्कर्ष नहीं निकाल लेना चाहिए कि निष्क्रिय विधि अनुपयोगी या कुछ कम उपयोगी है। उच्च कक्षाओं में जहाँ शिक्षार्थियों को अधिक पढ़ना पड़ता है, सिर्फ सक्रिय विधि से काम नहीं चल सकता-वहाँ तो निष्क्रिय विधि ही उपयोगी सिद्ध होती है। निष्क्रिय विधि में शरीर के अंगों में गति नहीं होती और विषय को शान्तिपूर्वक गहन अवधान के साथ पढ़ा जाता है। इस विधि की न केवल गति तीव्र होती है अपितु इसमें थकान भी अपेक्षाकृत काफी कम महसूस होती है। (9) बोधपूर्ण विधि (Intelligence Method)- बोधपूर्ण विधि में विषय-सामग्री या पाठ को सप्रयास समझ-बूझकर याद किया जाता है। इस विधि से याद की हुई सामग्री के स्मृति-चिह्न या संस्कार मस्तिष्क पर स्थायी होते हैं। सामग्री पुष्ट होकर स्मृति में लम्बे समय तक बनी रहती है। (10) यान्त्रिक या बोधरहित विधि (Rote Method)– यान्त्रिक या बोधरहित विधि के माध्यम से बिना समझे विषय-सामग्री को कंठस्थ किया जाता है। विषय को समझे बिना तोते की तरह रटने के कारण याद की हुई सामग्री अधिक समय तक मस्तिष्क में नहीं टिक पाती है। इसका कारण स्पष्ट है। कि प्रस्तुत सामग्री की मन के विचारों से साहचर्य स्थापित नहीं हो पाता है। शिक्षार्थी यन्त्र के समान पाठ को रटकर याद कर लेता है। (11) समूहीकरण तथा लय (Grouping and Rhythm)- समूहीकरण तथा लय के माध्यम से भी कण्ठस्थीकरण में सहायता मिलती है। याद की जाने वाली सामग्री को समूहों में बाँट देने से स्मरण की क्रिया आसान हो जाती है। इसी प्रकार पद्यात्मक सामग्री को लयबद्ध करके तीव्र गति एवं सुगमतापूर्वक याद किया जाता है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की सामग्री को कविता के रूप में बच्चों को सुविधापूर्वक याद कराया जाता है। (12) साहचर्य (Association)- कण्ठस्थीकरण की क्रिया में साहचर्य का बड़ा योगदान है। साहचर्य बनाकर स्मरण करने से धारणा स्थायी होती है। साहचर्य बनाने के लिए व्यक्ति स्वतन्त्र है, स्वयं के बनाये हुए साहचर्य अधिक लाभकारी व सहायक होते हैं। इसके लिए याद करते समय सामग्री से सम्बन्धित विभिन्न बातों का अन्य बातों से सम्बन्ध स्थापित करके उसे याद कर लिया जाता है। |
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