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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-मैंने पूछा, यह क्या लायी? बोल उठी वह ‘माँ काओ’।हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैंने कहा तुम्हीं खाओ॥पाया मैंने बचपन फिर से, बचपन बेटी बन आया।उसकी मंजुल मूर्ति देखकर, मुझमें नवजीवन आया।मैं भी उसके साथ खेलती-खाती हूँ, तुतलाती हूँ।मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥जिसे खोजती थी बरसों से, अब जाकर उसको पाया।भाग गया था मुझे छोड़कर, वह बचपन फिर से आया॥

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कठिन शब्दार्थ-‘माँ काओ’ = माँ खाओ। प्रफुल्लित = अत्यन्त प्रसन्न। मंजुल = सुन्दर।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री ने बेटी के रूप में आपने बचपन के दर्शन किए हैं। इससे उसके जीवन में नया उत्साह उत्पन्न हो गया। जीवन का तनाव दूर हो गया। वह स्वयं भी बच्ची जैसी बनकर बेटी के साथ खेलने लगी।

व्याख्या-कवयित्री ने अपनी छोटी-सी बिटिया की तोतली बोली में सुना ‘माँ खाओ’। यह सुनते ही उसका हृदय वात्सल्य से प्रफुल्लित हो उठा और उसने कहा-‘बिटिया ! तुम्हीं खाओ’। इस प्रकार वह स्वयं भी बच्ची बन गई। उसे लगा कि उसका बचपन ही बेटी बनकर आ गया है। इस घटना से उत्साहित होकर वह स्वयं भी बच्ची जैसी बन गई है। अब वह बेटी के साथ खेलती और खाती और तुतलाकर ही बोलती है। बेटी की भोली बातों बौर मनहमोहक क्रीड़ाओं को देखकर वह स्वयं भी बच्ची की तरह व्यवहार किया करती है। कवयित्री को लगता है कि वह जिस बचपन को वर्षों से खोज रही थी, उसे अब उसने बेटी के रूप में पा लिया है। जो बपचन उसे छोड़ कर भाग गया था, वह फिर से वापस आ गया है।

विशेष-
(i) घर में एक बेटी के आगमन से प्रफुल्लित सुभद्राजी, आज के ‘बेटी बचाओ’ अभियानकर्ताओं को भी संबोधित करती दिखाई देती हैं।
(ii) बच्चों से रहित घर के सूने-पन से बेचैन रहने वालों के लिए, सुभद्रा जी की यह रचना एक नवजीवनदायिनी औषध के समान है।
(iii) सरल भाषा-शैली के माध्यम से भी साहित्य पाठकों को आनंदित किया जा सकता है, इस बात का यह काव्यांश प्रत्यक्ष प्रमाण है।
(iv) सम्पूर्ण काव्यांश वात्सल्य रस से ओत-प्रोत है।
(v) ‘बचपन बेटी बन’, ‘मंजुल मूर्ति’ तथा ‘खेलती-खाती’ में अनुप्रास तथा ‘बचपन बेटी बन आया’ में मानवीकरण है।



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