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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी॥नंदन वन-सी फूल उठी, वह छोटी-सी कुटिया मेरी॥माँ ओ! कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी।कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने आई थी।पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतूहल था छलक रहा।मुँह पर भी आल्हाद लालिमा, विजय गर्व था झलक रहा। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ-बिटिया = छोटी सी बेटी। नंदनवन = स्वर्ग का उद्यान। फूल उठी = फूलों से भरी गई, आनंद से परिपूर्ण हो गई। कुटिया = झोंपड़ी, घर। पुलक रहे = रोमांचित हो रहे, हर्षित हो रहे। अंग = शरीर के भाग। दुग = नेत्र। कोतूहल = आश्चर्य। छलक = प्रकट हो रहा। आल्हाद = अत्यन्त हर्ष। लालिमा = लाली॥ संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री ने बताया है कि उसका बचपन फिर से आ गया है। व्याख्या-जब वह बचपन से फिर से आने के लिए अनुरोध कर रही थी, तभी उसकी छोटी-सी बेटी अचानक उसे ओ माँ’ कहकर पुकार उठी। कवयित्री ने अचानक उसकी ओर देखा तो देखती ही रह गई। बिटिया के बोलते ही ऐसा लगा कि कवयित्री का वह घर, प्रसन्नता के मारे स्वर्ग के नंदनवन के समान फूलों से भर गया हो। बेटी भी मिट्टी खाकर आई थी। कुछ मिट्टी अभी भी मुँह में थी और हाथ में भी मिट्टी थी, जिसे वह अपनी माँ को खिलाने के लिए आई थी। मिट्टी चखने का रोमांचित आनंद, उसके अंग-अंग से छलका पड़ रहा था। आँखों में भोला कौतूहल छाया हुआ था। मुख परम हर्ष से लाल हो रहा था और लगता था बिटिया को अपने मिट्टी खाने जैसे महान कार्य पर बड़ा गर्व भी हो रहा था। विशेष- |
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