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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-किए दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।किलकारी किल्लोल मचाकर, सूना घर आबाद किया॥रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिलाते थे।बड़े-बड़े मोती से आँसू जयमाला पहनाते थे॥मैं रोई, माँ काम छोड़ कर आई, मुझको उठा लिया।झाड़-पोंछ कर चूम-चूम, गीले गालों को सुखा दिया॥ |
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Answer» कठिन शब्दार्थ-दूध के कुल्ले = बच्चों द्वारा दूध को उगल देना। किलकारी = छोटे बच्चों की हर्षभरी आवाज। किल्लोल = बच्चों के खेल। आबाद = भरा-पूरा। जयमाला = विजयसूचक माला, बच्चों से रोकर अपनी बात मनवा लेना। सुखा दिया = (आँसू) होठों से पौंछ डाले। संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री ने बच्चों की मधुर क्रीड़ाओं का सजीव चलचित्र-सा अंकित कर दिया है। व्याख्या-कवयित्री कहती है कि उसने बचपन के सभी आनंद पाए। पीते-पीते दूध को मुँह से निकाल देना। अपना अँगूठा ऐसे चाव से चूसना, जैसे कोई अमृत पी रहा हो, आदि बच्चों की सभी सहज क्रियाएँ वह भी किया करती थी। अपनी किलकारियाँ और किलोलों से घर के सूनेपन को भर दिया करती थी। उसका किसी बात पर रोना या मचल जाना, सभी को बड़ा आनंदित किया करता था। जब उसकी आँखों से मोती जैसे बड़े-बड़े आँसू ढुलकने लगते तो सभी उसे मनाने में लग जाते थे। उसे अपने मचलने से जैसे मनचाही विजय मिल जाया करती थी। जब कभी कवयित्री रोने लगती तो उसकी माँ घर के सारे काम छोड़कर तुरंत आकर उसे गोद में भर लेती थी और उसके आँसुओं भीगे गालों को अपने होठों से चूम-घूमकर ही सुखा दिया करती थी। विशेष- |
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