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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-दादा ने चंदा दिखलाया, नैन नीर-युत दमक उठे।धुली हुई मुस्कान देखकर, सबके चेहरे चमक उठे।वह सुख का साम्राज्य छोड़कर, मैं मतवाली बड़ी हुई।लुटी हुई कुछ ठगी हुई सी, दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥लाज भरी आँखें थी मेरी, मन में उमंग रँगीली थी।तान रसीली थी कानों में, मैं चंचल छैल छबीली थी॥ |
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Answer» कठिन शब्दार्थ-नीर-युत = आँसुओं से भरे। धुली हुई = स्वच्छ, आँसुओं के बीच मुस्कराहट। चमक उठे = प्रसन्न हो गए। साम्राज्य = वातावरण। लुटी हुई = जिसका कुछ छिन गया हो। उमंग = उत्साह। रंगीली = प्रेमभरी। रसीली = मधुर। छैल-छबीली = सुंदर, बनी-ठनी। संदर्भ प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन से लिय गया है। इसे अंश में कवयित्री बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ने पर अपने मन में उठने वाली भावनाओं को प्रकाशित कर रही है। व्याख्या-कवयित्री कहती है-जब वह रोती थी तो उसके दादा उसे बहलाने के लिए चन्द्रमा दिखाया करते थे। तब उसकी आँसू भरी आँखों में प्रसन्नता की दमक आ जाती थी। आँसुओं के बीच उसकी सरल मुस्कान को देख सभी लोग प्रसन्न हो जाया करते थे। धीरे-धीरे बचपन बीता और उसे परम सुखों से भरे अपने स्वराज्य को छोड़ कवयित्री कुछ बड़ी हो गई। अब उसके मन की सरलता का स्थान एक मस्ती ने ले लिया। उसे लगता था जैसे उसका कुछ छिन गया था या किसी ने उसे ठग लिया था। उसका बचपन उससे दूर हो गया था। अब दौड़-दौड़ कर घर के द्वार पर जा खड़ी होती थी। उसके मन में घर के बाहर से संसार को देखने उत्सुकता भरी रहती थी। उसकी आँखों के भोलेपन का स्थान, अब एक संकोच ने ले लिया था। उसकी आँख लाज से झुकने लगी थीं। मन में एक प्रेम भरी पुलक-सी भरने लगी थी। उसके कानों में मधुर ध्वनियाँ गूंजने लगी थीं और अब वह एक चंचल और बन-ठनकर रहने वाली युवती बनने जा रही थी। विशेष- |
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