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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥चिंता रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छन्द।कैसा भूला जा सकता है, बचपन का अतुलित आनंद॥ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था, छुआ-छूत किसने जानी।बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥ |
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Answer» कठिन शब्दार्थ- निर्भय = भयरहित होकर। स्वच्छन्द = बिना रोक-टोक के। अतुलित = जिसकी तुलना न की जा सके। छुआ-छूत = छूने से बचना, किसी को छूने योग्य न मानना। चीथडों = फटे-पुराने कपड़ों में। संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री को अपने बचपन के समय की मधुर यादें आ रही हैं। व्याख्या-कवयित्री कह रही है कि उसे अपने बचपन की मधुर यादें बार-बार आती रहती है। उसे लगता है जैसे बचपन के जाने के बाद उसके जीवन में से मस्ती का समय चला गया। बचपन में वह बिना किसी चिंता के खेलती और खाया करती थी। वह बिना किसी भय के घूमा करती थी। भला बचपन के उस अनुपम आनंद को कैसे भूल सकती है। उस समय उसके लिए न ऊँचा था न नीचा। आज की तरह मन में किसी के भी प्रति छुआ-छूत का भाव भी नहीं था। उस समय तो वह स्वयं को झोंपड़ी और फटे-पुराने कपड़ों के बीच पलने वाली किसी रानी से कम नहीं समझा करती थी। विशेष- |
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