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‘जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण’ – में कवि की वेदना के साथ ही उसकी चेतना भी व्यक्त हुई है, इस कथन को समझाइए।

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कवि कहता है व्यक्ति जिस अभीष्ट को पाने की कामना करता है, वह उसे न भी मिले, जिसके कारण उसका जीवन त्रासद बन गया हो । समय बीतने पर उसकी समझ में आता है कि अतीत की सुखद स्मृतियों में डूबे रहना, अधूरी कामनाओं से दुःखी होना उचित नहीं है। अत: अपूर्ण कामना के बारे में न सोचकर, वर्तमान कठोर यथार्थ को स्वीकार कर भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए जो कुछ किया जा सकता है, उसे करना ही उचित है। कवि का यह परामर्श उसको चेतना को व्यक्त करता है।



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