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जाने कब तक घाव भरेंगे इस घायल मानवता के?जाने कब तक सच्चे होंगे सपने सब की समता के?सब दुनिया पर व्यथा पड़ी है, मेरी ही क्या बड़ी व्यथा! |
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Answer» प्रस्तुत पंक्तियाँ नरेन्द्र शर्मा, की ‘युग और मैं’ कविता से ली गई हैं। इनमें कवि ने दुनिया के भविष्य के प्रति निराशा प्रकट की है। कवि कहते हैं कि वर्तमान में संसार संहार की वृत्तियों में उलझा है। चारों ओर विध्वंस की स्थिति है। एक-दूसरे पर प्रभुत्व स्थापित करने की होड़ है। ऐसी दशा में मनुष्य की बराबरी (समता) की बातें केवल बातें ही रह जाएंगी। जबतक संसार में शांति और भाईचारे की भावना नहीं होगी तब तक मनुष्यता का वातावरण नहीं बनेगा। बिना उसके मानव-मानव की समानता का आदर्श कभी व्यवहार में नहीं आ सकेगा। कवि कहता है कि जब सारी दुनिया गैरबराबरी की पीड़ा से परेशान है तो मैं अपनी पीड़ा की क्यों चिंता करूं? |
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