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इस पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखो ।(या)“मैं सिनेमा हूँ” पाठ में सिनेमा ने अपने बारे में क्या बताया? लिखिए।(या)“मैं सिनेमा हूँ’ – पाठ में सिनेमा ने अपनी आत्मकथा बतायी । समझाइए

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”मैं सिनेमा हूँ…..” पाठ में सिनेमा आत्मकथा को हमारे सामने इस प्रकार पेश कर रहा है।

मैं सिनेमा हूँ। मैं प्रोजेक्टर के सहारे चलता हूँ। परदे पर दिखता हूँ। सभी लोगों का मनोरंजन करता हूँ। मेरा जन्म विदेश में हुआ किंतु भारत में मुझे लाने का श्रेय दादा साहेब फाल्के को जाता है। सन् 1913 में उन्होंने राजा हरिश्चंद्र के नाम से मुझे सभी लोगों के सामने लाया। तब मुझ में बोलने की क्षमता नहीं है। सन् 1931 में आलम – आरा नाम से बोलने की क्षमता सहित आपके सामने आ गया हूँ । मेरी कितनी प्रशंसा होने पर भी मेरा निर्माता मनुष्य ही है। उसी ने मुझे निर्जीव से सजीव बनाया |

मुझ में सभी भाव देखने को मिलते हैं। जैसे हास्य, दुःख, कल्पना और प्रेरणा आदि। मुझे बनाने में कई लोगों का योगदान होता है। कहानीकार कहानी, लिखने के बाद निर्माता उसे खरीदता है। निर्माता यहाँ से लेकर मुझे सिनेमाघरों तक पहुँचाने वाला व्यक्ति है।

निर्माता अपने इस काम को पूरा करवाने के लिए निर्देशक की सहायता लेता है। वास्तव में मेरा केंद्र बिंदु निर्देशक ही है। निर्देशक निर्माण से जुडे नायक – नायिका, पात्र, संगीत निर्देशक, कथाकार, संवाद लेखक, कैमरामेन आदि को एक सूत्र में बाँधकर मुझे साकार रूप देता है। मुझ से उनकी जीविका चलती है।

संसार में जिस प्रकार अच्छाई और बुराई है उसी प्रकार मुझ में अच्छे और बुरे हैं। मेरा निवेदन है कि आप अच्छाई को ही स्वीकार करें। मुझे सिनेमाघरों में ही देखें। पैरसी सी.डी. न तो खरीदो और न तो बेचो | चोरी की हुई फ़िल्म देखना या दिखाना दोनों कानूनन अपराध है।



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