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इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को भटियारखाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है ?

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लेखिका के पिताजी रसोईघर को भटियारखाना कहते थे, उनके अनुसार रसोई तक लड़की को सीमित कर देना, उसकी प्रतिभा को कुंठित कर देना है, जिसमें रहकर अपनी प्रतिभा को खत्म कर देना है। पिताजी नहीं चाहते थे कि लेखिका रसोई तक सीमित रहे । यदि वह रसोई में काम करेगी तो अपनी प्रतिभा संवारने का अवकाश नहीं मिलेगा।

रसोई वह स्थल है जहाँ भट्टी सुलगती रहती है और किसी-न-किसी के लिए कुछ-न-कुछ बनता रहता है। अत: पिताजी अपनी बेटी को भट्टी में झोंकना नहीं चाहते थे। वे चाहते थे कि मन्नू आम स्त्री से भिन्न होकर अपने व्यक्तित्व का विकास करे, अपनी अलग पहचान बनाए ।



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