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हरित क्रान्ति क्या है ? हरित क्रान्ति के लाभों तथा हानियों का उल्लेख कीजिए।याहरित क्रान्ति को परिभाषित कीजिए एवं इसके कोई चार लाभ लिखिए।याहरित क्रान्ति किसे कहते हैं? भारत में हरित क्रान्ति के कोई दो लाभ बताइए।याहरित क्रान्ति से आप क्या समझते हैं? भारत में हरित क्रान्ति को सफल बनाने के लिए सुझाव दीजिए। |
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Answer» हरित क्रान्ति हरित क्रान्ति का सम्बन्ध खेती की हरियाली और कृषि उत्पादकता को बढ़ाने से है। भारत की चौथी पंचवर्षीय योजना में देश को खाद्यान्नों के लिए आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य स्वीकार करते हुए हरित क्रान्ति का शुभारम्भ किया गया। हरित क्रान्ति का सम्बन्ध ऐसी रणनीति से है, जिसमें कृषि की परम्परागत तकनीक के स्थान पर आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते हुए कृषि उत्पादन में वृद्धि के प्रयास किये गये। आधुनिक कृषिगत उपकरणों, उन्नत बीजों, रासायनिक खादों, सिंचाई सुविधाओं का तेजी से प्रयोग बढ़ाते हुए कृषि क्षेत्र में उत्पादकता की दृष्टि से क्रान्ति लाने के प्रयास किये गये। उत्पादन तकनीक में सुधार करते हुए हल के स्थान पर ट्रैक्टर, गोबर खाद के स्थान पर रासायनिक खाद, परम्परागत घरेलू बीजों के स्थान पर उन्नत उर्वरता वाले बीज और मानसून पर सिंचाई की निर्भरता के स्थान पर ट्यूबवेल, पम्प आदि से सिंचाई करने के प्रयास हरित क्रान्ति के दौर से आरम्भ किये गये। हरित क्रान्ति के लाभ भारतीय कृषि पर हरित क्रान्ति के सफल प्रभावों में निम्नलिखित बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं – 1.हरित क्रान्ति से विभिन्न कृषि-फसलों का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। गेहूँ, ज्वार, बाजरा आदि खाद्य फसलों के उत्पादन में हुई तीव्र वृद्धि के कारण भारत आज खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो चुका है। 2.हरित क्रान्ति ने कृषि को एक सफल व्यवसाय के रूप में स्थापित किया है। आज कृषि किसान के लिए केवल पेट भरने की एक साधन मात्र नहीं है, वरन् आय-अर्जन का एक प्रमुख स्रोत बन चुकी है। 3.कृषि-क्षेत्र के विकास ने देश के औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया है। वर्तमान में कृषि का देश के पूँजी-निर्माण एवं बचतों में पर्याप्त योगदान है। 4.हरित क्रान्ति के कारण खाद्यान्नों की दृष्टि से भारत आत्मनिर्भर हो चुका है, जिससे देश में खाद्यान्नों के आयात में तेजी से कमी आयी है और भुगतान-सन्तुलन की प्रतिकूलता को कम करने में कृषि क्षेत्र ने पर्याप्त योगदान दिया है। 5.हरित क्रान्ति ने कृषि एवं सम्बन्धित क्रियाओं में रोजगार के पर्याप्त अवसर सृजित किये हैं, जिससे देश की व्यावसायिक संरचना विस्तृत एवं आय-अर्जक बन गयी है। 6.हरित क्रान्ति से कृषि श्रमिकों की आर्थिक दशा में सुधार आ गया है तथा यन्त्रों की सहायता मिलने से उनका कार्य भी सरल हो गया है। हरित क्रान्ति के दोष (हानियाँ) भारतीय कृषि पर हरित क्रान्ति के कुछ दोष भी हैं, जो निम्नवत् हैं – 1. कुछ फसलों तक सीमित – हरित क्रान्ति का प्रमुख दोष यह है कि यह गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि फसलों तक ही सीमित है। सभी फसलों को इसका लाभ नहीं मिल सका। व्यावसायिक फसलें इससे अछूती रही हैं। 2. कुछ राज्यों तक सीमित – हरित क्रान्ति कार्यक्रम केवल उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों तक ही सीमित रहा, जिससे राष्ट्र का सन्तुलित विकास नहीं हो पाया। अन्य प्रदेश इससे वंचित रह गये, जिससे प्रादेशिक विषमताएँ बढ़ गयीं। 3. बड़े कृषकों को लाभ – हरित क्रान्ति से केवल बड़े कृषकों को ही लाभ हुआ है, क्योंकि छोटे किसान साधनहीन होने के कारण इस कार्यक्रम का लाभ नहीं उठा सके हैं। 4. लक्ष्य से कम उत्पादन – हरित क्रान्ति का एक दोष यह है कि इसके आधार पर आशानुरूप उत्पादन की दिशा में सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। अत: लोगों का विश्वास इस कार्यक्रम से हट गया। 5. पर्यावरण विघटन – हरित क्रान्ति के अनेक पर्यावरणीय दुष्परिणाम हुए हैं। अत्यधिक सिंचाई के कारण भूमिगत जल-स्तर नीचा हो गया है तथा मृदा अपरदन और भूमि उत्पादकता का ह्रास हुआ है। एक ही फसल लगातार बोने तथा उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से भूमि के प्राकृतिक तत्त्व विनष्ट हो जाते हैं। इनक दीर्घकालीन दुष्परिणाम होते हैं। हरित क्रान्ति की सफलता सम्बन्धी सुझाव हरित क्रान्ति को सफल बनाने के उपाय/सुझाव निम्नलिखित हैं –
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