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दोहे का भावार्थ लिखें:बिना तेज के पुरुष की, अवशि अवज्ञा होय।आगि बुझे ज्यों राखको, आपु छुवै सब कोय ॥१०॥

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तुलसीदास जी कहते हैं कि तेजहीन मनुष्य का संसार में निश्चय ही अपमान होता है। अतः हर एक मनुष्य को अपना तेज, स्वाभिमान को बचाए रखना चाहिए। जिस प्रकार अग्नि के बुझ जाने पर, राख को न केवल स्पर्श करना सरल हो जाता है, अपितु उसे तो लोग रौंद भी देते हैं। वही जलती हुई आग का स्पर्श करना सहज नहीं होता है। उसी प्रकार तेजहीन मनुष्य का अपमान करना सरल है, परन्तु तेजयुक्त व्यक्ति का अपमान कोई नहीं कर सकता।



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