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‘चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ कविता का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।

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‘चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ कविता ‘धरती’ संग्रह में संकलित है। यह पलायन के लोक अनुभवों को मार्मिकता से अभिव्यक्त करती है। इसमें ‘अक्षरों’ के लिए ‘काले-काले’ विशेषण का प्रयोग किया गया है जो एक ओर शिक्षा-व्ययस्था के अंतर्विरोधों को उजागर करता है तो दूसरी ओर उस दारूण यथार्थ से भी हमारा परिचय कराता है, जहाँ आर्थिक मजबूरियों के चलते घर टूटते हैं।

काव्य नायिका चंपा अनजाने ही उस शोषक व्यवस्था के प्रतिपक्ष में खड़ी हो जाती है, जहाँ भविष्य को लेकर उसके मन में अनजान खतरा है। यह कहती है कलकत्ते पर बजर गिरे। कलकत्ते पर वन गिरने की कामना, जीवन के खुरदरे यथार्थ के प्रति चंपा के संघर्ष और जीवन को प्रकट करती है।



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