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चेहरों को आईनों के समान टूटा हुआ क्यों नहीं बताया गया है?

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आईने टूट जाते हैं, तो फिर उनका कोई मूल्य नहीं रहता। वे बेकार हो जाते हैं। कवि कहता है कि लोगों के चेहरे भी आईने की तरह टूटे हुए हैं। वे उदास और मायूस हैं। उन्हें अपना जीवन भी व्यर्थ लगता है। परंतु के आईने नहीं, मनुष्य हैं। परिस्थितियों ने उन्हें भले मिले तो उनके मन की टूटन दूर हो सकती है और उनके अरमानों की फसल लहलहा सकती है।



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