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भंगानी के युद्ध ( 1688 ई०) का विस्तृत वर्णन कीजिए।

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भंगानी का युद्ध 1688 ई० में पहाड़ी राजाओं तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी के बीच हुआ। इस युद्ध में भाग लेने वाले प्रमुख पहाड़ी राजा थे-बिलासपुर का शासक भीमचन्द, कटोच का शासक कृपाल, श्रीनगर का शासक फतेहशाह, गुलेर का शासक गोपालचन्द तथा जस्सोवाल का शासक केसर चन्द। इन राजाओं का मुखिया बिलासपुर का राजा भीमचन्द था।

कारण- गुरु जी तथा पहाड़ी राजाओं के बीच भंगानी के युद्ध के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

  1. गुरु जी ने अपने अनुयायियों को अपनी सेना में भर्ती करना आरम्भ कर दिया था। उन्होंने सैनिक सामग्री भी इकट्ठी करनी आरम्भ कर दी थी। पहाड़ी राजा गुरु जी की इन सैनिक गतिविधियों को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे।
  2. पहाड़ी राजा मूर्ति-पूजा में विश्वास रखते थे, परन्तु गुरु जी ने पाऊंटा में रहते हुए मूर्ति-पूजा का घोर खण्डन किया।
  3. गुरु जी अब शाही ठाठ-बाठ से रहने लगे थे। उनके इस कार्य से भी पहाड़ी राजाओं के मन में ईर्ष्या पैदा हो गई।
  4. गुरु जी पहाड़ी प्रदेश में रहकर सैनिक तैयारियां कर रहे थे। अत: पहाड़ी राजा यह नहीं चाहते थे कि गुरु जी के कारण उन्हें सम्राट औरंगज़ेब से उलझना पड़े।
  5. सिक्ख गुरु जी को बहुमूल्य भेटें देते रहते थे। इन भेंटों के कारण पहाड़ी राजा गुरु जी से ईर्ष्या करने लगे थे।
  6. इस युद्ध का तात्कालिक कारण यह था कि बिलासपुर के पहाड़ी राजा भीमचन्द ने अपने पुत्र की बारात को पाऊंटा में से गुज़ारना चाहा। परन्तु गुरु जी को उसकी नीयत पर सन्देह था, इसलिए उन्होंने उसे ऐसा करने की अनुमति न दी। क्रोध में आकर उसने अन्य पहाड़ी राजाओं की सहायता से गुरु जी पर आक्रमण कर दिया।

घटनाएं- गुरु साहिब ने युद्ध के लिए भंगानी नामक स्थान को चुना। युद्ध शुरू होते ही गुरु जी के लगभग 500 पठान सैनिक उनका साथ छोड़ गए। परंतु उसी समय सढौरा के पीर बुद्ध शाह अपने चार पुत्रों तथा 700 अनुयायियों सहित गुरु जी से आ मिला। 22 सितंबर 1688 ई० को दोनों पक्षों में एक घमासान युद्ध हुआ। वीरतापूर्वक लड़ते हुए सिक्खों ने पहाड़ी राजाओं को बुरी तरह हराया।

युद्ध का महत्त्व- भंगानी की विजय गुरु गोबिन्द सिंह जी के जीवन की पहली तथा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विजय थी। इसका निम्नलिखित महत्त्व था

  1. इस विजय से गुरु जी की शक्ति की धाक जम गई।
  2. गुरु जी को विश्वास हो गया कि वह अपने अनुयायियों को अच्छी तरह से संगठित करके मुग़लों के अत्याचारों का सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं।
  3. पहाड़ी राजाओं ने गुरु जी का विरोध छोड़कर उनसे मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर लिए।
  4. इस विजय ने गुरु जी को पाऊंटा साहिब छोड़कर फिर से आनन्दपुर में जाने का अवसर प्रदान किया।
  5. राजा भीमचन्द ने विशेषकर गुरु जी से मित्रता की नीति अपनाई।
  6. गुरु साहिब ने भीमचन्द की मित्रता का लाभ उठाते हुए आनन्दपुर में आनन्दगढ़, केशगढ़, लोहगढ़ तथा फतेहगढ़ नामक चार किलों का निर्माण करवाया।


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