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भाषा-विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।याभाषा का विकास बालक में किस प्रकार सम्भव है? इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त कीजिए।

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भाषा-विकास के मुख्य सिद्धान्त
(Main Theories of Language Development)

बालक में भाषा का विकास कुछ सिद्धान्तों के अनुसार होता है। इन सिद्धान्तों का विवरण निम्नलिखित है-
1. बोलने के लिए प्रेरणा- बालक को प्रारम्भ में बोलने के लिए किसी-न-किसी प्रकार की प्रेरणा या प्रोत्साहन की आवश्यकता रहती है। वह प्रारम्भ में अपनी मूल आवश्यकताओं के अनुसार ही बोलना सीखता है। दूसरे शब्दों में, बालक भाषा का प्रयोग करके अपने माता-पिता को अपनी विभिन्न आवश्यकताओं से अवगत कराने का प्रयास करता है। संक्षेप में, बालकों में भाषा का विकास प्रेरणाओं पर आधारित होता है।
2. अनुकरण- बालक का भाषा का विकास उसकी अनुकरण-क्षमता पर भी निर्भर करता है। वह अपने परिवारजनों द्वारा बोले गये शब्दों का भी अनुकरण बड़े चाव से करता है। अत: यह आवश्यक है कि बालकों के सम्मुख जिन शब्दों का प्रयोग किया जाए उनको शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण किया जाए।
3. स्वर यन्त्र की परिपक्वता- गले, फेफड़ों और स्वर यन्त्र के द्वारा शब्द उच्चारण का कार्य होता है। इनके अतिरिक्त तालू, होंठ, नाक और दाँत भी शब्दोच्चारण में सहायक होते हैं। ज्यों-ज्यों इन अंगों में परिपक्वता आती है, त्यों-त्यों भाषा विकसित होती है।
4. सम्बद्धता- बालक के भाषा-विकास में सम्बद्धता का अपना विशेष योग रहता है। वह अपने विकास-क्रम में शब्दों और उसके अर्थों का सम्बन्ध तथा साहचर्य समझने लगता है। उदाहरण के लिएबालक के सम्मुख जब ‘कुत्ता’ शब्द बोला जाता है, तो उसके सम्मुख कुत्ता उपस्थित किया जाता है। इस प्रकार कुत्ता शब्द के अर्थ से वह ‘कुत्ते’ नामक जानवर से परिचित हो जाता है। भविष्य में जब कभी ‘कुत्ता’ शब्द बोला जाता है तो बिना कुत्ता देखे ही बालक के मानस पटल पर उसकी प्रतिभा अंकित हो जाती है।



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