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भारत मे वन्य प्राणियो पर एक निबंध लिखिए।​

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  • वन और वन्यजीवन, यह प्रकृती, ही हमारे असतित्व की नींव है। इनका नष्ट एवम विलुप्त होना हमारे लिए खतरे का संकेत है। संरक्षण के प्रयासो द्वारा पेड़, पौधो, पक्षियों की प्रजातीयां सुरक्षित रहती है एवम फलति फूलती है, जो हमारे पर्यावरण के लिए बहुत लाभदायक है। जंगली जानवरों की प्रजातीयां भी सुरक्षित रहे तो यह भी अति उपयोगी है ।

  • प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हमारा देश भारत जैव-विविधता के सन्दर्भ में विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है । विश्व के कुल प्राणी जगत का 7% से अधिक और वनस्पति जगत का लगभग 11% भाग हमारे देश में ही अवस्थित है ।

  • प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हमारा देश भारत जैव-विविधता के सन्दर्भ में विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है । विश्व के कुल प्राणी जगत का 7% से अधिक और वनस्पति जगत का लगभग 11% भाग हमारे देश में ही अवस्थित है ।25 जैविक प्रान्तों और 14 जैव-भौगोलिक क्षेत्रों वाले इस देश में विश्वभर में पाए जाने वाले समस्त जीवों की 8% प्रजातियाँ (लगभग 16 लाख) विद्यमान हैं, किन्तु विगत शताब्दी के दौरान पारिस्थितिकी-तन्त्र पर प्रतिकूल मानवीय प्रभावों के दुष्परिणामस्वरूप भारत में वनस्पतियों की 100% और स्तनधारी जीवों की 20% प्रजातियाँ विलुप्तता की कगार पर हैं, जो हमारे लिए अत्यन्त ही गम्भीर और चुनौतीपूर्ण समस्या है ।

  • भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण (जेडएसआई) के अनुसार भारत में चीता, लाल सिर वाली बत्तख एवं पहाड़ी कुऔल विलुप्त हो चुके हैं । वर्ष 2014 में डेनमार्क की ‘आरहूस यूनिवर्सिटी’ के शोधार्थियों द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, हिमयुग में विशाल हिरण, दांतेदार बिल्ली, तेन्दुए के आकार बाले शेर एक बड़े कंगारू पाए जाते थे, किन्तु 1.32 लाख वर्ष पूर्व से लेकर एक हजार वर्ष पूर्व के मध्य इनका अन्त हो गया ।

  • भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण (जेडएसआई) के अनुसार भारत में चीता, लाल सिर वाली बत्तख एवं पहाड़ी कुऔल विलुप्त हो चुके हैं । वर्ष 2014 में डेनमार्क की ‘आरहूस यूनिवर्सिटी’ के शोधार्थियों द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, हिमयुग में विशाल हिरण, दांतेदार बिल्ली, तेन्दुए के आकार बाले शेर एक बड़े कंगारू पाए जाते थे, किन्तु 1.32 लाख वर्ष पूर्व से लेकर एक हजार वर्ष पूर्व के मध्य इनका अन्त हो गया ।इस रिपोर्ट में हिमयुग के पश्चात् 10 किग्रा से अधिक वजन वाले पशुओं की कुल 177 प्रजातियों के नष्ट होने की बात कही गई है । शोध में इस बात का खुलासा भी किया गया कि जिन क्षेत्रों में जीवों की 30% प्रजातियों का अन्त हुआ था, बही मनुष्यों की संख्या तेजी से बढ रही थी ।

  • भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण (जेडएसआई) के अनुसार भारत में चीता, लाल सिर वाली बत्तख एवं पहाड़ी कुऔल विलुप्त हो चुके हैं । वर्ष 2014 में डेनमार्क की ‘आरहूस यूनिवर्सिटी’ के शोधार्थियों द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, हिमयुग में विशाल हिरण, दांतेदार बिल्ली, तेन्दुए के आकार बाले शेर एक बड़े कंगारू पाए जाते थे, किन्तु 1.32 लाख वर्ष पूर्व से लेकर एक हजार वर्ष पूर्व के मध्य इनका अन्त हो गया ।इस रिपोर्ट में हिमयुग के पश्चात् 10 किग्रा से अधिक वजन वाले पशुओं की कुल 177 प्रजातियों के नष्ट होने की बात कही गई है । शोध में इस बात का खुलासा भी किया गया कि जिन क्षेत्रों में जीवों की 30% प्रजातियों का अन्त हुआ था, बही मनुष्यों की संख्या तेजी से बढ रही थी ।इस शोध-अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अब तक धरती पर इतने बड़े स्तर पर जीवों की प्रजातियों के नष्ट होने के पीछे मनुष्य ही कारण रहा है, न कि जलवायु परिवर्तन । हाल में जारी की गई IVCN Red List के अनुसार, वर्तमान समय में विद्यमान कुल 76 हजार प्रजातियों में से 21 हजार प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं ।

  • भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण (जेडएसआई) के अनुसार भारत में चीता, लाल सिर वाली बत्तख एवं पहाड़ी कुऔल विलुप्त हो चुके हैं । वर्ष 2014 में डेनमार्क की ‘आरहूस यूनिवर्सिटी’ के शोधार्थियों द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, हिमयुग में विशाल हिरण, दांतेदार बिल्ली, तेन्दुए के आकार बाले शेर एक बड़े कंगारू पाए जाते थे, किन्तु 1.32 लाख वर्ष पूर्व से लेकर एक हजार वर्ष पूर्व के मध्य इनका अन्त हो गया ।इस रिपोर्ट में हिमयुग के पश्चात् 10 किग्रा से अधिक वजन वाले पशुओं की कुल 177 प्रजातियों के नष्ट होने की बात कही गई है । शोध में इस बात का खुलासा भी किया गया कि जिन क्षेत्रों में जीवों की 30% प्रजातियों का अन्त हुआ था, बही मनुष्यों की संख्या तेजी से बढ रही थी ।इस शोध-अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अब तक धरती पर इतने बड़े स्तर पर जीवों की प्रजातियों के नष्ट होने के पीछे मनुष्य ही कारण रहा है, न कि जलवायु परिवर्तन । हाल में जारी की गई IVCN Red List के अनुसार, वर्तमान समय में विद्यमान कुल 76 हजार प्रजातियों में से 21 हजार प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं ।वाशिंगटन डीसी में 3 मार्च, 1973 को ‘विलुप्तप्राय प्रजातियों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय’ (CITES) पर हस्ताक्षर किए गए थे । 35 हजार से अधिक वनस्पतियों एवं जीव प्रजातियों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करने वाला 179 सदस्यीय देशों से सम्बद्ध यह समझौता सुनिश्चित करता है कि वनस्पति एवं जीव प्रजातियों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार इनके अस्तित्व हेतु सकट न बन जाए ।

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