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बाह्य आडम्बरों की अपेक्षा स्वयं (आत्म) को पहचानने की बात किन पंक्तियों में कही गई है ? अपने शब्दों में लिखें ।

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कबीर ने बाह्य आडम्बरों की जगह स्वयं को पहचानने की बात निम्नलिखित पंक्तियों में कही गई है –

“टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना ।।”

इन पंक्तियों का आशय यह है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्म के सही रूप को पहचानने के बजाय मिथ्या बाह्य आडंबरों की होड़ में लीन हैं । कोई टोपी पहनता है, कोई माला पहनता है, कोई छाप लगाता है, कोई तिलक लगाता है । सानी और शब्द गाना भूल गये हैं । स्वयं अपने आत्मतत्त्व को पहचानना ही भूल गये हैं।



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