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और सरसों की न पूछो –हो गई सबसे सयानी,हाथ पीले कर लिए हैंव्याह-मंडप में पधारीफाग गाता मास फागुनआ गया है आज जैसे।देखता हूँ मैं : स्वयंवर हो रहा है,प्रकृति का अनुराग-अंचल हिल रहा हैइस विजन में,दूर व्यापारिक नगर सेप्रेम की प्रिय भूमि उपजाऊ अधिक है।भावार्थ : कवि कहता है कि सरसों की तो बात ही मत पूछो। वह सबसे सयानी हो गई है। उसने अपने हाथ पीले करवा लिए हैं और ब्याह के मंडप में बैठ गई है। ऐसा लगता है कि होली के गीत गाता हुआ फागुन भी विवाहोत्सव में शामिल हो गया है। यह सब देखकर लगता है कि जैसे किसी का स्वयंवर हो रहा है। इस स्वयंवर में प्रकृति अपने प्यार का आँचल हिला रही है। वैसे तो यह एकदम निर्जन स्थान है। लेकिन भीड़-भाड़वाले व्यापारिक नगरों से अधिक प्रेम यहाँ देखने को मिल रहा है। यहाँ मनुष्य की तो बात मत पूछो, पेड़-पौधे भी प्यार करते हैं।1. किसे सयानी कहा गया है, और क्यों ?2. काव्यांश में किस ऋतु और माह का वर्णन है ?3. ‘देखता हूँ मैं : स्वयंवर हो रहा’ कवि ऐसा किस आधार पर कहता है ?4. नगरीय संस्कृति के प्रति कवि ने क्या आक्रोश व्यक्त किया है ?।5. ‘ब्याह-मंडप में पधारी’ में कौन-सा अलंकार है ?

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1. सरसों को सयानी कहा गया है क्योंकि अन्य फसलों की तुलना में सरसों थोड़ा पहले तैयार हो जाती है। सरसों पर पीले फूल जल्दी आ गए हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि वह किशोरावस्था पार कर चुकी है। विवाह योग्य हो गई है।

2. काव्यांश में वसंत ऋतु और फाल्गुन महीने का वर्णन है।।

3. कवि देखता है कि सरसों, अलसी, चना की फसलें सज-धजकर खड़ी हैं। चने ने अपने सिर पर लाल साफा बाँध लिया है। अलसी सिर पर नीले फूल लगाए हुए है। सरसों अपने हाथ पीले करके ब्याह मंडप में बैठी है। फागुन होली के गीत गा रहा है। इस तरह, इस समूचे वातावरण को देखकर कवि को लगता की स्वयंवर हो रहा है।

4. नगरीय संस्कृति के प्रति कवि आक्रोश व्यक्त करता हुआ कहता है कि शहरी संबंध व्यापारिक होते हैं। शहरों की अपेक्षा गाँव की जमीन प्यार के मामले में अधिक उपजाऊ है।

5. ‘ब्याह-मंडप में पधारी’ में मानयीकरण अलंकार है क्योंकि यहाँ ‘सरसों ब्याह के मंडप आई’ ऐसा कहकर उसे जीवंत मानव का रूप दिया गया है।



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