| 1. |
और पैरों के तले है एक पोखर,उठ रहीं इसमें लहरियाँ,नील तल में जो उगी है घास भूरीले रही वह भी लहरियाँ।एक चाँदी का बड़ा-सा गोल खंभाआँख को है चकमकाता।हैं कई पत्थर किनारेपी रहे चुपचाप पानी,प्यास जाने कब बुझेगी !भावार्थ : कवि कहता है कि वहीं खेत के पास में एक छोटा-सा तालाब है, जिसमें छोटी-छोटी लहरें उठ रही है। तालाब की नीली तली में भूरी-भूरी घास उग आई है। लहरों के साथ घास भी लहरा रही हैं। उस पानी में सूर्य की परछाई चमक रही है, जिससे आँखें चौंधिया रही हैं। वह परछाईं चाँदी के एक बड़े से खंभे की तरह दिखाई दे रही है। तालाब के किनारे पड़े छोटे-छोटे पत्थर इस तरह चुपचाप पानी पी रहे हैं जैसे उनकी प्यास कभी न बुझनेवाली हो1. भूरी घास कहाँ उगी हुई हैं ?2. कवि की आँखें क्यों चौंधिया रही हैं ?3. ‘प्यास जाने कब बुझेगी’ का आशय स्पष्ट कीजिए।4. तालाब का वर्णन कीजिए।5. ‘हैं कई पत्थर किनारेपी रहे चुपचाप पानी’ में कौन-सा अलंकार है ? |
|
Answer» 1. भूरी घास तालाब की तली में उगी हुई हैं। 2. सूर्य की परछाई तालाब में पड़ रही है। पानी के चमकने से परछाई गोलखंभे-सी प्रतीत हो रही हैं, जिसकी तरफ देखने से कवि की आँखें चौंधिया रही हैं। 3. तालाब के किनारे अनेक पत्थर पड़े हुए हैं। जो तालाब में उठनेवाली छोटी-छोटी लहरों को स्पर्श करते हैं। उसे देखकर कवि को लगता है कि जैसे वे पानी पी रहे हों। वह सोचता है कि इन पत्थरों की प्यास पता नहीं कब बुझेगी, क्योंकि वे इसी तरह लंबे समय से पानी पी रहे हैं। 4. कवि जिस खेत की मेड़ पर बैठा है वहीं पास में एक छोटा-सा तालाब है। उसके स्वच्छ पानी में हवा के झोंकों के साथ छोटी छोटी लहरें उठ रही हैं। तालाब के नीले तल में भूरी-भूरी उगी हैं, वे भी लहरों के साथ लहरा रही हैं। पानी में सूर्य का प्रतिबिंब बन रहा है, जो चाँदी के खंभे जैसा दिखाई दे रहा है। 5. ‘हैं कई पत्थर किनारे |
|