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‘अर्थशास्त्र’ से संबंधित भारतीय चिंतन की जानकारी दीजिए । |
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Answer» भारत की सभ्यता और संस्कृति का इतिहास लगभग पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है । इसी कारण भारतीय तत्त्वचिंतन में मानवजीवन के विविध पहलूओं का अध्ययन और मार्गदर्शन देखने को मिलता है । मनुष्य के चार पुरुषार्थ हैं :
‘कुछ प्राप्त करने की’ अपेक्षा होनेवाली प्रवृत्ति यह ‘अर्थ पूर्ण’ प्रवृत्ति है । जीवननिर्वाह और भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए अर्थोपार्जन करना (आय प्राप्त करना) यह मनुष्य का कर्तव्य है । लगभग 2500 वर्ष पहले ‘अर्थशास्त्र’ नाम की पुस्तक में कौटिल्य (चाणक्य) ने मानवीय प्रवृत्ति के लिए चिंतन प्रस्तुत किया था । उनके अनुसार ‘मनुष्य की वृत्ति अर्थ है, मनुष्य के निवास करनेवाली भूमि अर्थ है इसलिए पृथ्वी के लालन-पालन (देखभाल) के उपाय दर्शानेवाला शास्त्र अर्थात् अर्थशास्त्र ।’ भारतीय चिंतन में मानव कल्याण का समग्रता के साथ विचार होता था । आर्थिक प्रवृत्ति भी मात्र ‘अर्थ’ केन्द्रित न रहकर नैतिक आधार के साथ समग्र मानवकल्याण को ध्यान में रखकर होता है । इसलिए चाणक्य के अर्थशास्त्र पर नीतिशास्त्र का प्रभाव है । चाणक्य के अधिकांशतः आर्थिक विचारों में सार्वजनिक और सामूहिक व्यवहारवाली आर्थिक प्रवृत्ति ही केन्द्र में है । विशेष रूप से कौटिल्य ने अपने मार्गदर्शन में राजाशाही राज्य व्यवस्था और कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था की आर्थिक बातों को प्रस्तुत किया है । |
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