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अंग्रेजों की वन नीतियों के प्रति बस्तर वासियों की प्रतिक्रिया और उसका परिणाम बताइए।

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1905 ई0 में औपनिवेशिक सरकार ने भारत के दो तिहाई वनों को आरक्षित करने और घुमंतू खेती, शिकार और वन्य उत्पादों के संग्रहण पर रोक लगा दी। मूलतः वनों पर जीवन-यापन करने वाले बस्तर-वासी सरकार के इस निर्णय से चिंतित हो उठे। काँगेर वन के धुरवा सम्प्रदाय के लोगों ने सबसे पहले सरकार की वन नीतियों का विरोध कर क्रान्ति की शुरुआत की।
1910 ई० में आम की टहनियाँ, मिट्टी का एक ढेला, लाल मिर्च और तीर गाँव-गाँव भेजे जाने लगे। प्रत्येक ग्रामीण ने क्रांति के खर्च में कुछ-न-कुछ योगदान दिया। बाजारों को लूटा गया, अधिकारियों व व्यापारियों के घरों, स्कूलों व पुलिस थानों को लूटा वे जलाया गया और अनाज का  पुनर्वितरण किया गया। जिन पर हमले हुए उनमें से अधिकतर लोग औपनिवेशिक राज्य और इसके दमनकारी कानूनों से किसी-न-किसी तरह जुड़े हुए थे। अंग्रेजों ने इसका कड़ा
प्रत्युत्तर दिया और विद्रोह को दबाने के लिए सैनिक टुकड़ियाँ भेजीं। अंग्रेज फौज ने आदिवासियों के तंबुओं को घेरकर उन पर गोलियाँ चला दीं। जिन लोगों ने बगावत में भाग लिया था उन्हें पीटा गया और सजा दी गई। अधिकांश गाँव खाली हो गए क्योंकि लोग भाग कर जंगलों में चले गए थे। यद्यपि वे विद्रोह के मुखिया गुंडा धूर को कभी नहीं पकड़ सके। विद्रोहियों की सबसे बड़ी जीत यह रही कि आरक्षण का काम कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया और आरक्षित क्षेत्र को भी 1910 ई० से पहले की योजना से लगभग आधा कर दिया गया।



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