| 1. |
अकाली लहर ने स्वतन्त्रता संग्राम में क्या योगदान दिया? |
|
Answer» अकाली लहर का जन्म अकाली लहर में से हुआ। इसका संस्थापक किशन सिंह गड़गज था। इसका उदय गुरुद्वारों में बैठे चरित्रहीन महंतों का सामना करने के लिए हुआ। सरकार के पिठुओं से टक्कर लेने के लिए ‘चक्रवर्ती’ जत्था बनाया गया। कुछ समय के पश्चात् अकालियों ने ‘बब्बर अकाली’ नामक समाचार-पत्र निकाला। तभी से इस लहर का नाम बब्बर अकाली पड़ गया। महंतों के साथ अन्य सरकारी पिटाओं से निपटना भी इसका उद्देश्य था। स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान- बब्बर अकालियों ने मुखबिरों तथा सरकारी पिठुओं का अंत करने की योजना बनाई। बावरों की भरमा इस ‘सुधार करना कहते थे। बब्बरो को विश्वास था कि यदि सरकारी मुखाबरों का सफाया कर दिया जाये तो अंग्रेजी सरकार असफल हो जाएगी और भारत छोड़कर चली जायेगी। उनकी मुख्य गतिविधियों का वर्णन इस प्रकार है — 1. शस्त्रों की प्राप्ति– बब्बर अकाली अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शस्त्र प्राप्त करना चाहते थे। उनके अपने सदस्य भी शस्त्र बनाने का यत्न कर रहे थे। शस्त्रों के लिए धन की आवश्यकता थी। धन इकट्ठा करने के लिए बब्बरों ने सरकारी पिठ्ठओं से धन और शस्त्र छीने। 2. सैनिकों से अपील- बब्बरों ने पंजाबी सैनिकों से अपील की कि वे अपने शस्त्र धारण करके स्वतन्त्रता प्राप्ति का प्रयास करें। 3. समाचार-पत्र- बब्बरों ने साइक्लोस्टाइल मशीन की सहायता से अपना समाचार-पत्र ‘बब्बर अकाली दुआबा’ निकाला। इस समाचार-पत्र का चंदा यह था कि इसे पढ़ने वाला, इस समाचार-पत्र को आगे पाँच अन्य व्यक्तियों को पढ़ाता था। 4. सरकारी पिठुओं की हत्या- बब्बरों ने अपने समाचार-पत्रों में उन 179 व्यक्तियों की सूची प्रकाशित की जिनका उन्हें ‘सुधार’ करना था। सूची में सम्मिलित जिस व्यक्ति का अंतिम समय आ जाता, उसके बारे में वे अपने समाचार-पत्र द्वारा ही उस व्यक्ति को सूचित कर देते थे। दो-तीन बब्बर उस व्यक्ति के गाँव जाते और उसे मौत के घाट उतार देते। वे खुलेआम वध करने की जिम्मेवारी भी लेते थे। उन्होंने पुलिस से भी डटकर टक्कर ली। 5. सरकारी अत्याचार– सरकार ने भी बब्बरों को समाप्त करने का निश्चय कर लिया। उनका पीछा किया जाने लगा। उनमें से कुछ को पकड़ लिया गया और कुछ मारे गए ! सौ से भी अधिक बब्बरों पर मुकद्दमा चलाया गया। 27 फरवरी, 1926 ई० को जत्थेदार किशन सिंह, बाबू संता सिंह, धर्म सिंह हयातपुरा तथा कुछ अन्य बब्बरों को फांसी का दण्ड दिया गया।इस प्रकार बब्बर लहर अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में असफल रही। फिर भी इस लहर ने पंजाबियों को देश की स्वतन्त्रता के लिए अपनी जान पर खेल जाने का पाठ पढ़ाया। |
|