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आयोजन और अंकुश जुड़वा बालक के समान है ।

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आयोजन में प्रवृत्ति के बारे में समय के संदर्भ में लक्ष्यांक निश्चित किये जाते हैं और अंकुश अर्थात् निश्चित लक्ष्यांक या आधार के अनुसार कार्य हो रहा है या नहीं उसकी जाँच करके की गई भूलों का पुनरावर्तन रोकना है । इस प्रकार अंकुश कार्य करते समय आयोजन को ध्यान में लिया जाता है ।

आयोजन में अगर खामी रह गई हो तो अंकुश कार्य भी निष्फल होगा उसी प्रकार आयोजन योग्य हो परंतु अंकुश कार्य में लापरवाही रही होगी तो भूलों का पुनरावर्तन चालू रहेगा और आयोजन में निश्चित किये गये लक्ष्यांक समयसर सिद्ध करना मुश्किल होगा । … इस चर्चा पर से कहा जा सकता है कि एक कार्य की तकलीफ दूसरे कार्य को बिनअसरकारक बनाती है । जुड़वे बालक में भी एक की तकलीफ हो तो दूसरे पर असर होती है । इसी बात को ध्यान में रखकर आयोजन व अंकुश को जुड़वे बालक के समान माना है ।



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