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‘आओ मिलकर बचाएँ’ कविता का केन्द्रीय भाव स्पष्ट कीजिए।

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इस कविता में दोनों पक्षों का यथार्थ चित्रण हुआ है। बृहतर संदर्भ में यह कविता समाज में उन चीजों को बचाने की बात करती है जिनका होना स्वस्थ सामाजिक परिवेश के लिए जरूरी है। प्रकृति के विनाश और विस्थापन के कारण आज आदिवासी समाज संकट में है, जो कविता का मूल स्वरूप है। कवयित्री को लगता है कि हम अपनी पारंपरिक भाषा, भावुकता, भोलेपन, ग्रामीण संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

प्राकृतिक नदियाँ, पहाड़, मैदान, मिट्टी फसल, हवाएँ – ये राब आधुनिकता का शिकार हो रहे हैं। आज के परिवेश में विकार बढ़ रहे हैं, जिन्हें हमें मिटाना है। हमें प्राचीन संस्कारों और प्राकृतिक उपादानों को बचाना है। वह कहती हैं कि निराश होने की बात नहीं है, क्योंकि अब भी बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है।



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