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८ 05७2 ५०0] ४1६ , 912: 2-10 260 , 1सं० T 222

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पृथ्वीराज रासो'' एक ऐसा महाकाव्य है जिसे साहित्य का सर्वाधिक प्राचीन महाकाव्य माना जाता हैं | अब तक कई प्रतिया प्रकाश में आई हैं | इसकी कई प्रतियाँ उदयपुर राज्य के पुस्तकालय में सुरक्षित रखा गया हैं | इसकी सभी उपलब्धियाँ प्रतियाँ संवत 1750 बाद लिपिबद्ध की गई है |

प्रारम्भ में ''रासो'' को एक प्रमाणिक ग्रन्थ समझा गया था | फ्रांस के विद्वान् ''गार्सा द तासी'' ने भी इसे प्रामाणिक माना था | बंगाल की ''रॉयल एशियाटिक सोसाइटी'' ने तो इसका प्रकाशन भी शुरू कर दिया था , किन्तु इसी बिच सन 1875 ई० में ''प्रो० बूलर'' को कश्मीर में ''जयानक'' द्वारा रचित ''पृथ्वीराज विजय'' नामक संस्कृत काव्य उपलब्ध हुआ |



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