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2. काव्य गुणों का रसों से क्या सम्बन्ध है? |
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Answer» काव्यगुण काव्य में आन्तरिक सौन्दर्य तथा रस के प्रभाव एवं उत्कर्ष के लिए स्थायी रूप से विद्यमान मानवोचित भाव और धर्म या तत्व को काव्य गुण या शब्द गुण कहते हैं। यह काव्य में उसी प्रकार विद्यमान होता है, जैसे फूल में सुगन्ध। अर्थात काव्य की शोभा करने वाले या रस को प्रकाशित करने वाले तत्व या विशेषता का नाम ही गुण है। काव्य गुण मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं - 1. माधुर्य गुण किसी काव्य को पढने या सुनने से ह्रदय में जहाँ मधुरता का संचार होता है, वहाँ माधुर्य गुण होता है। यह गुण विशेष रूप से श्रृंगार, शांत, एवं करुण रस में पाया जाता है। (अ) माधुर्य गुण युक्त काव्य में कानों को प्रिय लगने वाले मृदु वर्णों का प्रयोग होता है, जैसे - क,ख, ग, च, छ, ज, झ, त, द, न, ...आदि। (ट वर्ग को छोडकर) (ब) इसमें कठोर एवं संयुक्ताक्षर वाले वर्णों का प्रयोग नहीं किया जाता। (स) आनुनासिक वर्णों की अधिकता। (द) अल्प समास या समास का अभाव। इस प्रकार हम कह सकते हैं,कि कर्ण प्रिय, आर्द्रता, समासरहितता, चित की द्रवणशीलता और प्रसन्नताकारक काव्य माधुर्य गुण युक्त काव्य होता है। उदाहरण 1. बसों मोरे नैनन में नंदलाल, मोहिनी मूरत सांवरी सूरत नैना बने बिसाल। उदाहरण 2. कंकन किंकिन नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन राम हृदय गुनि॥ उदहारण 3. फटा हुआ है नील वसन क्या, ओ यौवन की मतवाली । देख अकिंचन जगत लूटता, छवि तेरी भोली भाली ।। 2. ओज गुण |
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