1.

1रस्सी कच्चे धागे की, खींच रही मैं नाव।जाने कब सुन मेरी पुकार, कर देव भवसागर पार।पानी टपके कच्चे सकोरे, व्यर्थ प्रयास हो रहे मेरे।जी में उठती रह-रह हूक, घर जाने की चाह है घरे।।2खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,न खाकर बनेगा अहंकारी।सम खा तभी होगा समभावी,खुलेगी साँकल बंद द्वार की।​

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