'विष्टा पूय रुधिर कच हाडाबरषइ कबहुं उपल बहु छाडा'(वह कभी विष्ठा, खून, बाल और हड्डियां बरसाता था और कभी बहुत सारे पत्थर फेंकने लगता था।)भारत के विभाजन पर लिखे साहित्य में उस समय मची मारकाट के कई वीभत्स दृश्यों का चित्रण सआदत हसन मंटो, खुशवंत सिंह, भीष्म साहनी की रचनाओं में देखा जा सकता है।
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