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आरुणि का शरीर सर्दी से अकड़ने लगा किंतु उसे तो एक ही धुन... गुरु की आज्ञा का पालन। बहता हुआ पानी कल-कल करता मानो आरुणि को कहने लगा-

मैं वर्षा का बहता पानी,

मेरी चाल बड़ी तूफानी।

उठ आरुणि अपने घर जा,

रास्ता दे दे, हट जा, हट जा।।

मगर गुरु भक्त बालक आरुणि का उत्तर था-

गुरुजी का आदेश मुझे है,

मैं रोकूंगा बहती धारा।

जय गुरु देवा, जय गुरु देवा,

आज्ञा पालन काम हमारा।।



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